एक वाक्य मेंअनुबंध की वस्तु, उसकी क़ीमत या सौंपने के समय में अज्ञानता या भारी अनिश्चितता, जिससे किसी एक पक्ष को पता न हो कि उसे क्या मिलेगा।
सीधी बात
अनुबंध की शर्त है कि दोनों पक्ष जानें क्या बेचा जा रहा है, कितने में, और कब सौंपा जाएगा। थोड़ा ग़रर, जिससे कोई लेन-देन ख़ाली नहीं होता, माफ़ है, लेकिन भारी ग़रर अनुबंध को बिगाड़ देता है।
इसीलिए इस्लामी वित्त के अनुबंध वस्तु को सटीक रूप से तय करते हैं, मुराबहा की क़ीमत शुरू से ज्ञात होती है, और सलम की विशेषताएँ व सौंपने की तारीख़ तय होती हैं। अकाउंटेंट के लिए: स्पष्ट शर्तें मापना और दर्ज करना भी आसान बनाती हैं।
उदाहरण
किसी फ़ार्म की ऐसी फ़सल को, जो अभी उगी नहीं, बिना उसकी मात्रा या गुण तय किए एकमुश्त क़ीमत पर बेचने में ग़रर है, क्योंकि ख़रीदार को बहुत कुछ मिल सकता है या कुछ भी नहीं। जबकि तय मात्रा, गुण और तारीख़ के साथ सलम में उसे बेचना यह अज्ञानता दूर कर देता है।
इसे इससे न मिलाएँ
रिबा (ब्याज)रिबा ऋण में या रिबवी धन के आदान-प्रदान में हराम बढ़ोतरी है, जबकि ग़रर ख़ुद अनुबंध में अज्ञानता है।
